मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 43

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“आख़िरी ड्यूटी”: रेलवे हॉस्पिटल की आत्मारात के साढ़े बारह बज रहे थे। �शहर के पुराने रेलवे हॉस्पिटल की इमारत दूर से ही अजीब-सी लगती थी—ऊँची, पीली पड़ी दीवारें, कई जगह से उखड़ा हुआ प्लास्टर, और बीच-बीच में टिमटिमाती ट्यूब लाइटें, जो जैसे हर पल बुझने की धमकी दे रही हों। �चारों तरफ़ सन्नाटा था, बस कभी-कभी किसी दूर जाती मालगाड़ी की सीटी रात की ख़ामोशी को चीरती हुई सुनाई दे जाती। �हॉस्पिटल के गेट के पास खड़े गार्ड रमेश ने अपनी जैकेट को सीने तक खींचकर बंद किया।ठंडी हवा अजीब तरह से चुभ रही थी, जबकि दिन में इतनी ठंड