एपिसोड 17: राख से उठती उम्मीदगेस्ट हाउस का मंज़र:अज़ीम ने आईने में खुद को देखा। उसने ज़ारा के भेजे हुए साफ कपड़े पहने थे, पर उसकी आँखों में अभी भी वही पुरानी सादगी और हल्का सा डर था। उसे लग्जरी गेस्ट हाउस की दीवारों से घुटन हो रही थी। उसे अपनी वही छोटी सी लकड़ी की दुकान याद आ रही थी, जहाँ परिंदों का शोर था, न कि इन महँगे कमरों का सन्नाटा।उसने मेज़ पर रखे खाने को हाथ तक नहीं लगाया। उसका मन बस एक ही बात सोच रहा था— "क्या ज़ोया साहिबा के ठीक होने के बाद दुनिया