धुंधली यादें: एक अधूरी दास्तान शहर की कंक्रीट की दीवारों और इंसानी शोर के बीच कुछ ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं, जो किसी उपन्यास के आखिरी पन्ने तक पहुँचने की ज़िद नहीं करतीं। दिल्ली जैसे शहर में, जहाँ हर कोई किसी न किसी रेस में भाग रहा है, आर्यन और मीरा का मिलना एक ठहराव की तरह था। यह कहानी कागज़ पर गिरी स्याही की उस बूंद जैसी है, जो अपनी मर्ज़ी से फैलती गई, जिसने कोई निश्चित आकार तो नहीं लिया, लेकिन कागज़ के रेशे-रेशे में अपनी छाप छोड़ दी।: इंतज़ार की कसक – लौटते लम्हों की आहटआर्ट एग्जीबिशन की