अध्याय 3: नियति का उपहास और काली परछाइयांशून्य-प्रस्थ के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर मोहिनी के वे पाषाण-हृदय सिपाही कई ऋतुओं से भटक रहे थे। उन्होंने उन तमाम देशों को अपने पैरों तले रौंदा था जहाँ मोहिनी का भय नमक की तरह हवा में घुला था। पर जैसे ही उन काली परछाइयों ने 'रजत-गिरि' की पावन सीमा पर अपना पहला कदम रखा, एक अजीब सी हलचल हुई। उस भूमि की मिट्टी का स्पर्श होते ही, उन शक्तिशाली सैनिकों के पैर किसी जलती हुई लकड़ी की तरह चटकने लगे। बिना किसी तलवार या बाण के, वे अजय योद्धा नीली लपटों में घिर गए