कमरे में हल्की रोशनी थी।टेबल पर नक्शे फैले हुए थे, कुछ जगहों पर लाल गोले बने हुए… और एक कोने में रखी बोतल आधी खाली हो चुकी थी।बाहर से आती ठंडी हवा परदे को हिला रही थी…और अंदर बैठे अजय सिंह की आंखें किसी गहरी सोच में डूबी हुई थीं।वहीं सामने कुर्सी पर बैठा विजय डोभाल एक और पैग बनाता है… और बिना सोचे समझे एक ही सांस में गटक जाता है।विजय (हल्की नशे में) "हां तो… तू कुछ कह रहा था…"अजय उसकी तरफ देखता है… फिर धीरे से बोलता है।अजय सिंह –"मैंने कहा था ना… नूर जहां के प्लेस में