17.3.26 हज़ज मुसम्मन सालिम मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन 1222 1222 1222 1222 , इशारों में कहीं पर कुछ, निशानी छोड़ आते हैं जिसे समझो तुम्ही मन से, कहानी छोड़ आते हैं , ये अपनी कोई आदत है, नहीं मालूम हमको भी अदावत जिससे करते हैं, जवानी छोड़ आते हैं , हुआ ये हाल अपना भी ,बगीचे में किसी दिन तो घड़ी भर राह तकने, ख़ुद के मानी छोड़ आते हैं , हमी तो मोल ठहराते कहीं, सामान की हरदम हमी सौदा कहीं पे ,बद-जुबानी छोड़ आते हैं , पटाना बस नहीं आया ,कहीं क़िस्मत हमें अपनी ये ऐसी शय जहाँ