शून्यप्रस्थ: एक अंतहीन महागाथा - 2

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अध्याय 2: नियति का नया खेल​शून्य-प्रस्थ की वादियों में आज एक उत्सव की गूँज थी। कंचन धरा की उस भीषण तबाही से दूर, 'रजत-गिरि' की भूमि अपनी चाँदी जैसी चमकती चट्टानों और बर्फीली हवाओं के लिए जानी जाती थी। यहाँ के सम्राट राजसिंधु का विशाल रथ, जो श्वेत अश्वों द्वारा खींचा जा रहा था, नगर की गलियों से गुज़र रहा था। रथ पर स्वर्ण की बारीक नक्काशी थी और उस पर लगे ध्वज हवा में लहरा रहे थे। सम्राट स्वयं अपनी प्रजा के बीच आए थे ताकि वे अपने इकलौते पुत्र 'विक्रमादित्य' के दूसरे जन्म-दिवस के महा-उत्सव का निमंत्रण दे