जिद्द: एक खामोश गुनाह

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बाहर बिजली कड़क रही थी, लेकिन मेरे अंदर का शोर उससे भी तेज़ था। मैं उस आलीशान बंगले के दरवाज़े पर खड़ी कांप रही थी। मेरे हाथ में वो कागज़ थे जिन्होंने मेरी पूरी ज़िंदगी को एक सौदे में बदल दिया था।"अंदर आओ, अवनी!" एक भारी और ठंडी आवाज़ गूंजी।मैंने नज़रें उठाकर सामने देखा। हॉल के बीचों-बीच, सिगार का धुआं उड़ाते हुए सिद्धार्थ सिंघानिया खड़ा था। उसकी काली शर्ट के ऊपर के दो बटन खुले थे और उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो मुझे अंदर तक झकझोर रही थी।"मैं... मैं यहाँ नहीं रह सकती," मैंने अपनी आवाज़ को