खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 18

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"ख़ामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात"भाग 18: “फैलती आवाज़ और रहस्यमयी परछाई”रचना: बाबुल हक़ अंसारीपिछले खंड से…“तो फिर अगला कदम उठाओ…इस बार किसी को बचना नहीं चाहिए।”  शहर में फैलती किताबसुबह का शहर कुछ अलग ही लग रहा था।गली-गली, चौराहों और कॉलेज की दीवारों पर एक ही पर्चा चिपका था —“रघुवीर त्रिपाठी की आख़िरी आवाज़ — जल्द आ रही है।”छात्र हाथों में कॉपियाँ लिए घूम रहे थे।कोई लाइब्रेरी में बैठकर पन्ने लिख रहा था,तो कोई चाय की दुकान पर लोगों को पढ़कर सुना रहा था।धीरे-धीरे ये पांडुलिपि एक किताब से बढ़कर आवाज़ बनती जा रही थी।एक बुज़ुर्ग ने पन्ना पढ़कर कहा