दो दिन बाद। नया अड्डा। शहर के दूसरे छोर पर एक और पुराना माल-गोदाम। चारों तरफ धूल जमी हुई थी। बड़े-बड़े कंप्यूटर, स्क्रीन, मशीनें — सब पर प्लास्टिक के कवर पड़े थे। जैसे किसी ने जल्दी में सब यहाँ जमा कर दिया हो। बीच में एक मेज़ पर बैठा था जोगी। स्क्रीन पर लगातार सर्च विंडो खुल रही थीं। नवीना जांगिड़। एक पुरानी तस्वीर उभरी। “मिस जहानाबाद प्रतियोगिता — विजेता।” एक तंग स्विम-सूट में फोटो, कई साल पहले की। दूसरी फोटो। रैम्प पर चलती मॉडल। फिर कुछ सालों का खालीपन। गूगल के पन्नों पर बस एक लाइन— “सामाजिक कार्यकर्ता।” जोगी