अपराजिता लढवान की मौत को दो महीने बीत चुके थे। शहर के बाहरी हिस्से में एक पुराना गोदाम। ऊपर से टूटी हुई टीन की छत। अंदर लोहे की गंध और पसीने की महक। गोदाम के एक कोने में एक मेज़ पर फाइलों का ढेर। उनमें आधा डूबा हुआ बैठा था — अनीश। चश्मा नाक के नीचे सरक आया था। कागज़ पलटते-पलटते आखिर उसने सिर उठाया और मुस्कुरा उठा। “मिल गया।” अनीश मुस्कुराया। “आख़िरकार एक ढंग की लीड मिल ही गई।” फ़ाइल उठाकर फेंक दी। थोड़ी दूर पर कोने में लगे छोटे से जिम में जोगी। नंगे बदन, सिर्फ पैंट पहने,