संभावित सिंह सामने तनकर खड़ा था। चेहरे के एक तरफ़ जले के पुराने निशान — दाग़दार, चकत्तों जैसे उभरे हुए। अपराजिता अपने डेस्क पर एक फ़ाइल पलट रही थी। कुछ पल बाद उसने उसे तेज़ आवाज़ के साथ बंद कर दिया। “अनीश की लाश कहाँ है?” अपराजिता की आवाज़ धीमी थी, पर धारदार। “तूने तो कहा था कि एक्सीडेंट में कोई नहीं बचा। सिर्फ़ जोगिंदर सांगवान।” संभावित सिंह ने पसीना पोंछा। “जी वो… उस समय—” “बकवास बंद कर!” अपराजिता गरजी। कुर्सी से थोड़ा आगे झुकी। “अड़तालीस घंटे। मुझे अनीश चाहिए। ज़िंदा… या मुर्दा। समझा?” संभावित सीधा होकर सलाम ठोंकता है।