छोटा कमरा। कैमरा ट्राइपॉड पर। लाइट तीखी। कोई एंकर नहीं। कोई डिबेट नहीं। बस सीधा कैमरा। वर्षा कुर्सी पर बैठी है। दो टेक हो चुके हैं। तीसरे टेक से पहले की चुप्पी। वर्षा के मन में एक विचार आया। “ये आख़िरी बार है जब मैं सच बोल सकती हूँ। इसके बाद लौटना मुमकिन नहीं होगा।” अब वो रिकॉर्ड बटन की तरफ़ देखती है। और बोलना शुरू करती है। आवाज़ हल्की काँपती है — लेकिन शब्द साफ़। रूकती है, बोलती है, आँसू पोंछती है। एक जगह वो अटकती है। फिर खुद ही रिपीट करती है। और अंत में चुप हो जाती