वर्षा पेन को मेज़ पर टिक-टिक कर रही थी। एक ही रिदम। नसों में उतरती हुई। सौना की बात कहकर अपराजिता लढवान न जाने कहाँ चली गई थी। कमरे में एयर-कंडीशनिंग ठंडी थी, पर वर्षा की हथेलियाँ पसीने से भीगी थीं। तभी दरवाज़ा खुला। वही नौकरानी। “आइए वर्षा दीदी,” उसने सिर झुकाकर कहा। “मैडम ने आपको बुलाया है।” वर्षा एक पल ठिठकी। फिर उठी। चल पड़ी। लंबे गलियारों से गुज़रते हुए, कई बंद दरवाज़े पार करके, वे एक पॉलिश्ड लकड़ी के भारी दरवाज़े के सामने रुकीं। अंदर से हल्का-सा धुआँ निकल रहा था। नौकरानी ने दरवाज़ा खोला। भीतर जाते ही