अगली सुबह। नदी के किनारे हल्की धूप उतर रही थी। दूर झाड़ियों के पास जोगी की मोटरसाइकिल खड़ी थी। वर्षा घुटनों के बल बैठी नोट्स ले रही थी। रेत पर कुछ पुराने निशान थे — आधे मिटे हुए। जोगी काला चश्मा पहने खड़ा था। नदी में कंकड़ फेंक रहा था। हर कंकड़ पानी में गिरकर गोल-गोल लहरें बना रहा था। वह कभी-कभी पैर से रेत उछाल देता। वर्षा ने बिना ऊपर देखे पूछा— “पुलिस को यहाँ से कुछ नहीं मिला?” जोगी के चेहरे पर एक तंज भरी मुस्कान उभरी। “दस-दस गाँव पर एक थाना है,” वह बोला। “पुलिस यहाँ कुछ