कबलोई जाने वाली बस खटारा थी। सीटों का फोम बाहर निकला हुआ। खिड़कियाँ आधी बंद, आधी जाम। हर गड्ढे पर बस ऐसे उछलती जैसे विरोध कर रही हो। वर्षा मलिक खिड़की के पास बैठी थी। उसकी गोद में एक फ़ाइल खुली थी। पीले पड़ चुके अख़बार की कतरनें। “तीसरी बच्ची लापता।” “प्रशासन पर सवाल।” ब्लॉग पोस्ट के प्रिंटआउट — गाँव में तांत्रिक सक्रिय? बच्ची खुद भागी? राजनीतिक साज़िश? वह पन्ने पलटती जाती है। हर केस में एक समानता। उम्र। समय। और फिर — अचानक चुप्पी। फोन वाइब्रेट करता है। स्क्रीन पर नाम चमकता है — मिश्रा सर। वह कॉल काट