दस वर्षीया पारुल दौड़ती जा रही है। नदी के किनारे-किनारे। रेत पैरों में चुभ रही है, मगर वह हँस रही है। बालों में दो चोटियाँ हैं, हरी फ्रॉक हवा में लहरा रही है। पैरों में न चप्पल हैं, न जूते। “क्या कर रहे हो, भैया?” वह पीछे देखकर हँसते-हँसते बोलती है। “ये कौन-सा खेल है?” वह दौड़ती रहती है। “मेरा सर घूम रहा है, भैया,” उसकी आवाज़ में अब थकान उतर आई है। “मुझे आराम करना है।” एक पेड़ के पास पहुँचकर वह लड़खड़ाती है। घुटनों के बल गिरती है। फिर वहीं ज़मीन पर लेट जाती है। “और नहीं, भैया,”