रूहों का सौदा - 17

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​अध्याय 17: ईर्ष्या की अग्नि और टूटती मित्रता​​महागुरु की घोषणा ने जश्न के रंग में भंग डाल दिया था। जैसे ही यह साफ़ हुआ कि लौरा पहले राउंड में अपना कौशल दिखाएगी और रुद्र को अंत तक इंतज़ार करना होगा, पूरे गुरुकुल की हवा ही बदल गई। जो उत्सव अभी तक मिलन और भाईचारे का प्रतीक था, वह अब सुलगते हुए विरोध और ईर्ष्या की राख में बदलने लगा था। मशालों की रोशनी अब भी वही थी, पर उनमें से निकलने वाला धुआं अब आँखों में चुभने लगा था।​रुद्र की साख पर सवाल और सुलगता असंतोषउत्तर परिसर (लड़कों) के छात्रों