हमराज - 18

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ज़ेबा बोलती जा रही थी और वह दोनों उसे सुन रहे थे. ज़ेबा फिर आगे बोली, “अम्मी आपके जैसे मैंने भी यह कभी सोचा नहीं था के मै आपसे जींदा इस जनम में दुबारा मील पाऊँगी. मैंने भी ठान लीया था के अपने जान की बाजी लगाकर उन दरींदो को उनके अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लुंगी. मैंने भी जीने की चाह छोड़ दी थी और एक जींदा लाश की तरह जी रही थी. लेकिन मेरे अंदर वह इंतकाम की आग लगातार जल रही थी और जल रही है. इस वज़ह से मेरा मकसद था के उनके सारे राज जानना