विराज मल्होत्रा के चले जाने के बाद भी काव्या वहीं हॉल में खामोश खड़ी रही। उसके दिल की धड़कनें अब भी सामान्य नहीं हुई थीं। वह पुराना दरवाज़ा और उस पर लटका भारी पीतल का ताला—जैसे कोई चीख-चीखकर कह रहा हो कि यहाँ कुछ ऐसा दफन है जिसे बाहर आने की इजाजत नहीं है। विराज की वे आँखें, जिनमें नफरत के पीछे छिपी बेबसी की झलक उसने देखी थी, काव्या के जेहन से हट नहीं रही थीं।अगली सुबह सूरज की रोशनी जब आलीशान बंगले की खिड़कियों से छनकर अंदर आई, तो माहौल रात के मुकाबले काफी शांत था। काव्या नाश्ते