कब्रिस्तान की चुड़ैल

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है।कालीपुर में उस बच्चे के जन्म के बाद, समय जैसे रुक गया था। दिन निकलते थे लेकिन सूरज की रोशनी गाँव तक नहीं पहुँचती थी। मुर्गे सुबह अपनी बाँग लगाते, पर आवाज़ में जीवन नहीं था। लोग जी रहे थे लेकिन जैसे उनकी आत्माएँ पहले ही कहीं खो चुकी हों। घरों में सन्नाटा गूँज रहा था।बच्चे की आँखें खुली थीं। वह रोता नहीं था, हँसता नहीं था, बस देखता था। उसकी मुस्कान में कुछ ऐसा था जिसे महसूस करने वाला हर कोई डर से काँप उठता। दाई, जिसने उसे जन्म दिया था कांपते हुए कहती