श्रापित हवेली का रक्त-रंजीत रहस्यराजस्थान के धोरों के बीच बसा 'कुलधरा' गाँव अपनी वीरानी के लिए मशहूर था, लेकिन उसी के पास एक और गुमनाम इलाका था जिसे लोग 'कालखोर' कहते थे। कालखोर के आखिरी छोर पर खड़ी थी— 'ठाकुर विक्रम सिंह की हवेली'। यह हवेली सिर्फ ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं थी, बल्कि बीते सौ सालों के काले इतिहास की गवाह थी। स्थानीय लोग कहते थे कि सूरज ढलते ही इस हवेली की दीवारों से खून रिसने लगता है और पायल की झंकार के साथ सिसकियों का दौर शुरू हो जाता है।अतीत की काली छायाहवेली का इतिहास 1920 के दशक