शहर के शोर से दूर एक पुरानी लाइब्रेरी थी, जहाँ लोग किताबें कम और खुद से मिलने ज़्यादा आते थे। वहीं पहली बार आरव ने सिया को देखा। वो खिड़की के पास बैठी थी, बाहर गिरती हल्की बारिश को देखती हुई, जैसे पन्नों से ज़्यादा मौसम पढ़ रही हो।नज़रें टकराईं।कोई मुस्कान नहीं,कोई सवाल नहीं—फिर भी कुछ थम गया।आरव अगले कई दिनों तक उसी समय आने लगा। किताबें बदलीं, कुर्सी वही रही। सिया ने कभी सीधे नहीं देखा, पर हर बार पन्ना पलटते समय उसकी आँखें अनजाने में आरव की ओर उठ जातीं।पहली बात बहुत साधारण थी।“ये जगह तुम्हें पसंद है?”“हाँ…