उसने अपना दायां हाथ धीरे से उस पुराने बरगद के खुरदरे तने पर रखा। जिस जगह उसकी ठंडी उंगलियां पड़ीं, वहाँ की हरी काई पलक झपकते ही किसी जली हुई माचिस की तीली की तरह सूख कर काली पड़ गई। तने के बीचों-बीच एक गहरी दरार खामोशी से चौड़ी हुई, जैसे पेड़ ने खुद अपना सीना चीर दिया हो। वह रहस्यमयी कन्या बिना कोई आहट किए उस अंधेरे में समा गई। दरार वापस जुड़ गई। वहां सिर्फ सूखी पत्तियों की सरसराहट बची थी, मानो पल भर पहले वहां कोई था ही नहीं... बस हवा में चंदन की वह भारी महक