ज़ोया और अज़ीम के बीच का वह बेनाम रिश्ता अब शहर की हवाओं में महसूस होने लगा था। वे अब अक्सर उन जगहों पर मिलते थे जहाँ कोई उन्हें पहचान न सके—कभी किसी पुराने मंदिर की सीढ़ियों पर, तो कभी शहर के आखिरी छोर पर बसे एक छोटे से पार्क में।एक कच्चा अहसास:एक शाम, अज़ीम ने ज़ोया को अपनी माँ की पुरानी डायरी से एक सूखा हुआ 'हरसिंगार' का फूल दिखाया।"साहिबा, ये फूल खिलते तो रात में हैं, पर अपनी खुशबू पूरे दिन के लिए छोड़ जाते हैं। हमारी दोस्ती भी वैसी ही है... शायद हम हमेशा साथ न रहें,