मेरा प्यार - 5

​एपिसोड 4: बेनाम लगाव और ऊँची दीवारें​वक़्त पंख लगाकर उड़ रहा था। ज़ोया और अज़ीम के बीच अब वह हिचकिचाहट खत्म हो चुकी थी। वे अब हर शाम मिलते—कभी दरिया के किनारे, तो कभी शहर की पुरानी गलियों में। उनके बीच जो था, उसे 'प्यार' का नाम देना शायद जल्दबाज़ी होती, पर वह दोस्ती से कहीं बढ़कर था। वह एक ऐसा 'लगाव' था जहाँ दो रूहें एक-दूसरे की खामोशी में भी बात कर लेती थीं।​ज़ोया को अज़ीम की सादगी से लगाव था, और अज़ीम को ज़ोया की उस मासूमियत से, जो उसके रईसाना लिबास के पीछे छुपी थी।​एक सुकून भरी