देशों की सीमित परिधि में सिसकती मानवीय संवेदना

राष्ट्रीय परिधियों में सिसकती संवेदना— विवेक रंजन श्रीवास्तवमनुष्य का समूचा इतिहास वस्तुतः उसकी निरंतर गति और अदम्य जिज्ञासा का ही इतिहास है। पुरातन काल के उस आदिम मनुष्य की कल्पना कीजिए, जिसकी आँखों में पूरा आकाश समाया था और जिसके पाँव किसी कृत्रिम सीमा को नहीं पहचानते थे। तब धरती माँ थी, और उसका असीम विस्तार ही 'घर' था। कबीले चलते थे, सभ्यताएँ प्रवास करती थीं और संस्कृतियाँ किसी अविरल बहती नदी की तरह एक-दूसरे में विलीन हो जाती थीं। तब न देशों के बीच कोई कँटीली बाड़ थी, न कोई पासपोर्ट न ही वीजा । मनुष्य की पहचान उसके