भाग 1: अनजान राहेंइलाहाबाद के पास एक छोटा सा गाँव था—मुरारीपुर। कहने को तो यह गाँव था, लेकिन यहाँ की हवाओं में एक अजीब सी भारीपन और सन्नाटा था। समीर, एक शहर का पढ़ा-लिखा लड़का और पेशे से आर्किटेक्ट, अपने पुराने पारिवारिक इतिहास को खोजने इस गाँव आया था। उसे पता चला था कि उसके परदादा की एक पुरानी हवेली यहाँ खंडहर बनी खड़ी है।गाँव के चाय वाले, बूढ़े काका ने जब समीर को हवेली जाते देखा, तो टोक दिया— "बेटा, सूरज ढलने से पहले लौट आना। उस हवेली की दीवारों के भी कान नहीं, बल्कि रूहें होती हैं।"समीर हँस