अध्याय 8: स्मृतियों का पाताल और महागुरु का मौन भंगगुरुकुल के उस विशाल कक्ष में मशालों की रोशनी दीवारों पर नाच रही थी, जैसे वे भी आने वाले सच से भयभीत हों। आचार्या वसुंधरा का व्यक्तित्व इस समय किसी जलती हुई ज्वाला के समान था। उनके चेहरे पर वह सौम्यता कहीं लुप्त हो चुकी थी जिसके लिए कन्या गुरुकुल की छात्राएं उनका सम्मान करती थीं। उनके हाथों की मुट्ठियाँ कसी हुई थीं और उनकी आवाज़ में वह अधिकार था जिसे ठुकराना महागुरु के लिए भी असंभव था।वसुंधरा ने चिल्लाकर कहा, महागुरु! यह मौन अब आपको अपराधी बना रहा है। बाहर