सदियों से तुम मेरी - 3

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कॉलेज का दिन सामान्य रूप से खत्म हो चुका था। सूरज ढलने लगा था और आसमान में हल्की नारंगी आभा फैल रही थी। स्टूडेंट्स अपने-अपने घरों की ओर लौट रहे थे। दिव्या भी अपनी किताबें बैग में रखकर कॉलेज के गेट की ओर बढ़ रही थी। नेहा किसी काम से रुक गई थी, इसलिए आज दिव्या को अकेले ही घर जाना था।कॉलेज से उसके घर तक का रास्ता ज्यादा लंबा नहीं था, लेकिन रास्ते में एक पुराना पार्क पड़ता था, जहाँ शाम के समय अक्सर सन्नाटा छा जाता था। दिव्या आमतौर पर उस रास्ते से जल्दी-जल्दी निकल जाती थी। आज