मौत की दस्तक: हर पन्ने पर एक नई दहशत। - 19

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: “दरभंगा की वह बंद हवेली”दरभंगा की पुरानी गलियों में एक हवेली थी—ऊँची, खामोश और समय से भी पुरानी। लोग उसे बस “सेन हवेली” कहते थे। कहते हैं, वहाँ रात के बाद कोई नहीं जाता। और जो गया… वो कभी पहले जैसा लौटकर नहीं आया।अक्टूबर की ठंडी शाम थी। हवा में सीलन और धुएँ की मिली-जुली गंध थी। आसमान पर बादल ऐसे तैर रहे थे जैसे किसी ने काली स्याही उड़ेल दी हो। पटना से आई एक रिसर्च स्कॉलर, आर्या, उस हवेली के सामने खड़ी थी। वह लोककथाओं पर रिसर्च कर रही थी और उसे दरभंगा की इस हवेली के