अध्याय 7: द्वार का प्रलय और वसुंधरा का क्रोधलौरा का नाम वसुंधरा के कानों में किसी खंजर की तरह चुभा। वह शिष्या, जिसे उन्होंने अंधेरे से लड़ना सिखाया था, आज खुद अंधेरे की गोद में जा बैठी थी।आचार्य विक्रम के आदेश पर जैसे ही द्वारपालों ने भारी जंजीरें खींचीं, गुरुकुल के विशाल किवाड़ एक भयानक चरमराहट के साथ खुल गए। बाहर रात का घना अंधेरा और कोहरा था, लेकिन उस धुंध को चीरती हुई एक आकृति बिजली की तरह भीतर प्रविष्ट हुई। वह आचार्या वसुंधरा थीं।उनके चेहरे पर वह शांति नहीं थी जो आमतौर पर कन्या गुरुकुल की प्रधान के