भाग 1बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।आसमान से गिरती हर बूँद जैसे किसी गुनाह की गवाही दे रही हो। हवेली के पुराने फाटक के बाहर खड़ी मीरा की साड़ी पूरी तरह भीग चुकी थी, बाल उसके चेहरे से चिपके थे, और आँखों में सिर्फ़ एकसवाल—“क्या यही मेरी ज़िंदगी का फ़ैसला है?”उसके सामने खड़ा था आरव सिंह राठौर।लंबा, चौड़े कंधे, तीखी आँखें—और चेहरा ऐसा, जैसे पत्थर पर उकेरा गया हो। बारिश उसके काले कोट से फिसल रही थी, लेकिन उसकी आँखों में ज़रा भी नमी नहीं थी।“मैंने कहा था… देर मत करना,”उसकी आवाज़ भारी थी। सख़्त। हुक्म जैसी।मीरा ने