यह “मैं दादा-दादी की लाडली” की कहानी का पाँचवाँ अध्याय है।बचपन की मासूमियत और सपनों के बाद,अब मेरी ज़िंदगी एक ऐसे मोड़ पर आ गई थीजहाँ मुझे अपने लिए नहीं,बल्कि हालातों के आगे झुककर फैसला लेना पड़ा।घरवालों ने मेरी शादी तय कर दी।मैंने बहुत मना किया, बहुत समझाया, लेकिन मेरी बात किसी ने नहीं सुनी।जिस लड़के से मेरी शादी होनी थी, उससे मैंने पहले कभी बात तक नहीं की थी।घरवालों ने बस इतना कहा —“शादी के बाद सब ठीक हो जाता है।”फिर भी… शादी हो गई।शादी के बाद धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा किहर रिश्ता सिर्फ नाम का नहीं होता,