कुछ कहानियाँ अचानक शुरू नहीं होतीं।वे धीरे-धीरे बनती हैं—दिनों के साथ, आदतों के साथ, और उन छोटी-छोटी बातों के साथ जिन पर कोई ध्यान नहीं देता। सुबह घर से निकलना, शाम को लौटना, रास्ते में दिखते चेहरे, और रात में छत को देखते हुए कटता वक़्त। बाहर से सब कुछ वैसा ही रहता है जैसा होना चाहिए, लेकिन भीतर कुछ खिसकता रहता है। आदमी बदल नहीं रहा होता, बस थोड़ा-थोड़ा सरक रहा होता है—अपनी ही जगह से।हम सब किसी न किसी जगह से आते हैं। किसी गली से, किसी घर से, किसी आवाज़ों से भरे माहौल से। और वही जगह,