सूखी रोटियों का दशक11991 की गर्मियों में जब गाँव के कुएँ सूखने लगे, तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि सिर्फ पानी नहीं, आने वाले सालों में आदमी की उम्मीद भी सूख जाएगी।बिहार के उस छोटे से गाँव—हरिहरपुर—में रामसहाय रहता था। उम्र कोई चालीस के आसपास, पर चेहरे पर बुज़ुर्गों जैसी थकान।उसके पास डेढ़ बीघा ज़मीन थी—जो काग़ज़ में उसकी थी, पर पेट के काम नहीं आती थी।घर में पत्नी सरस्वती, बूढ़ी माँ और दो बच्चे—गुड्डी और मोहन।उस दिन सरस्वती ने चूल्हा नहीं जलाया।“आज भी?” माँ ने पूछा।सरस्वती ने सिर झुका लिया।“कल से अनाज नहीं है।”रामसहाय बाहर आँगन में बैठ