वेलेंटाइन- डे, एक अधूरी शुरुआत ‎- 5

‎‎ part- 5‎‎‎सुहानी ने मोबाइल को देर तक देखा।‎‎हर्ष का voice note अब भी वहीं था—‎सुना हुआ, लेकिन महसूस नहीं किया गया।‎‎उसका मन बार-बार उसी सवाल पर अटक रहा था—‎अगर किसी आवाज़ से दिल काँप जाए,‎तो क्या उसे सुनना ज़रूरी होता है?‎‎वह जानती थी,‎डर हमेशा शोर नहीं करता।‎कभी-कभी वह बहुत शांत होता है।‎‎उधर हर्ष ने लैपटॉप खोला।‎‎सुहानी का मैसेज पढ़ते ही‎उसने टाइप करना शुरू किया—‎‎“ज़रूरी नहीं…‎लेकिन कभी-कभी सच से भागने का‎एक ही तरीका होता है—‎उसे सुन लेना।”‎‎मैसेज भेजते ही‎उसने स्क्रीन बंद कर दी।‎‎वह इंतज़ार नहीं करना चाहता था।‎‎दोपहर तक‎सुहानी ने कोई जवाब नहीं दिया।‎‎काम में मन नहीं लग रहा था।‎डैशबोर्ड