रूहों का सौदा - 5

​अध्याय 5: सन्नाटे में उपजा कोलाहल​महागुरु के कक्ष से निकले उस आदेश ने 'विशाल गुरुकुल' की सोई हुई आत्मा को झकझोर कर रख दिया था। बाहर सर्द हवाएँ अब केवल चल नहीं रही थीं, बल्कि दीवारों से टकराकर किसी घायल भेड़िये की तरह कराह रही थीं। आधी रात का समय था, जब आमतौर पर गुरुकुल के गलियारे केवल पहरेदारों की धीमी पदचाप से गूँजते थे, लेकिन आज सन्नाटे की परतें कुछ और ही कह रही थीं।​संकट की गूँज​अचानक, मुख्य मीनार पर लगा 'संकट-घंटा' बज उठा। यह कोई साधारण आवाज़ नहीं थी। इसकी भारी और गूँजती आवाज़ केवल तभी निकाली जाती