अध्याय की शुरुआतउस रात आसमान पर चाँद नहीं था।या शायद था… लेकिन उसने खुद को छुपा लिया था।हवेली के पीछे फैला जंगल ऐसा लग रहा था जैसे साँस ले रहा हो। पेड़ों की शाखाएँ हवा में हिलते हुए ऐसे चरमराती थीं मानो किसी पुराने गुनाह की गवाही दे रही हों।और उसी अँधेरे के बीच—एक नाम गूंजा।“आरव मल्होत्रा…”आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी।वो सीधी उसके दिमाग़ में उतरी थी।आरव ने झटके से आँखें खोल दीं।पसीना उसकी गर्दन से बहता हुआ तकिये को गीला कर चुका था। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा, अभी छाती फाड़कर बाहर निकल