अमावस्या की रात

अमावस्या की रात विधि को हमेशा से ही अजीब लगती थी।न चाँद, न उसकी रोशनी—बस काली चादर ओढ़े आसमान और सन्नाटे से भरा घना अँधेरा, जो मन के भीतर तक उतर जाता था।उस रात भी कुछ अलग नहीं था।रेलवे ट्रैक के पास बने उस छोटे-से घर में विधि अकेली रहती थी।लोग कहा करते थे—अमावस्या की रात ठीक 12:07 बजे कोई ट्रेन उस ट्रैक से नहीं गुजरती…पर आवाज़ ज़रूर आती है।लेकिन जैसा कहा जाता है, सच अंधविश्वास से बड़ा होता है।विधि इन बातों पर कभी विश्वास नहीं करती थी। कोई कुछ कहता तो वह हँसकर टाल देती।जब तक कि उस रात…वह