'विशाल गुरुकुल' का सबसे ऊँचा शिखर, जिसे 'ब्रह्म-कक्ष' कहा जाता था, आज किसी श्मशान जैसी शांति ओढ़े हुए था। बाहर सर्द हवाएँ दीवारों से टकराकर कराह रही थीं, लेकिन कक्ष के भीतर का वातावरण उससे भी कहीं अधिक ठंडा और तनावपूर्ण था।कक्ष के केंद्र में ऊँचे आसन पर महागुरु विराजमान थे। उनकी श्वेत जटाएँ कंधे तक बिखरी थीं और माथे पर खिंची तीन रेखाएँ—जिन्हें आमतौर पर ज्ञान का प्रतीक माना जाता था—आज चिंता की गहरी खाइयों में बदल चुकी थीं। उनके सामने गुरुकुल के चार प्रमुख आचार्य, जो स्वयं शस्त्र और शास्त्र के प्रकांड विद्वान थे, अपराधी की भांति सिर