में और मेरे अहसास - 143

कैसे मैं शृंगार लिखूँ  कैसे मैं शृंगार लिखूँ, जब के पाकीज़ा हुस्न बहकता हैं ll आज महफिल में नशीली संगत में अंग अंग छलकता हैं ll   कुछ ज्यादा ही रोनक और रोशनी छाई हुई है कि l कब से सुलगता जलवा देखने को दिवाना तड़पता हैं ll   भावों में आवारापन, जहां आँखों में शर्म की नजाकत l खिलती कलियां औ नव पल्लवित गुल को तरसता हैं ll   हुस्न की मल्लिका सोला शृंगार कर आने वाली है तो l आज स्वागत के वास्ते पत्ता पत्ता बूटा बूटा महकता हैं ll   निगाहों में समाकर दिल में बसा लेने