सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोशिश कर रही हो। उसे फिर वही सपना आया था—घने जंगल, बहता पानी और दूर कहीं चमकती हुई दो सुनहरी आँखें। यह सपना पिछले कई सालों से उसका पीछा कर रहा था, लेकिन हर बार जागते ही उसके टुकड़े धुंधले हो जाते थे।दिव्या ने सिर झटककर खुद को सामान्य किया और बिस्तर से उठ गई। उसके कमरे की दीवारों