दूसरी ओर... गुरुकुल का श्मशान सा सन्नाटागुरुकुल के भीतर, तबाही के निशान और भी गहरे थे। आचार्य विक्रम और आचार्या वसुंधरा मलबे के बीच खड़े उन शिष्यों को देख रहे थे जिन्होंने वीरता से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। पूरे परिसर में मंत्रों की गूँज की जगह अब सिसकियों ने ले ली थी। महागुरु, जो हमेशा अडिग रहते थे, आज उस मुख्य द्वार की चौखट पर ऐसे बैठे थे जैसे कोई पुराना किला ढह गया हो। खंडहरों का न्याय और पुराना हिसाब"रुद्र ने कांपते हाथों से उस ताबीज को उठाया, जिसकी धातु रात की ओस में और भी ठंडी