मैं दादा-दादी की लाड़ली - 3

यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाड़ली” का तीसरा अध्याय है।यह अध्याय उस मासूम एहसास की बात करता हैजिसे हम अपना पहला प्यार कहते हैं।स्कूल के दिनों में हमारी ज़िंदगी कितनी सरल होती है, यह तब समझ नहीं आता,लेकिन जब यादों में लौटते हैं, तो वही दिन सबसे खूबसूरत लगते हैं।उन्हीं दिनों में हमारी कक्षा में एक नया दोस्त आया।उसकी मौजूदगी ने बिना कुछ कहे ही मेरे मन में हलचल मचा दी।उससे मिलने की छोटी-छोटी बातें,उसकी मुस्कान, उसकी हंसी और उसका बात करने का तरीकामुझे हर दिन थोड़ा-सा और अपना सा लगने लगा।पहली बार जब उसने मुझसे बात की,तो मेरा दिल