परछाइयों का शहर

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"क्या तुम्हें सच में लगता है कि तुम यहाँ से वापस जा पाओगे?"अंधेरे कमरे में यह आवाज़ किसी सूखे पत्ते के रगड़ने जैसी थी। राघव ने टॉर्च जलाई। रोशनी के घेरे में धूल के कण नाच रहे थे, लेकिन आवाज़ कहाँ से आई, इसका पता नहीं चला। घड़ी में रात के तीन बज रहे थे, लेकिन इस हवेली के भीतर वक्त जैसे जम गया था।"कौन है? मिसेज डिसूजा, आप हैं क्या?" राघव की आवाज़ कांप रही थी।जवाब में सिर्फ एक ठंडी हवा का झोंका आया जिसने कमरे की इकलौती मोमबत्ती बुझा दी।---तीन दिन पहले।"बेटा, इस शहर की तासीर अलग है।