बोलती खिड़की

एक अरसे बादमैंने फिर से कलम उठाई—लिखने के लिए नहीं,बल्कि इसलिए किखामोशीअब ज़्यादा बोलने लगी थी।दो–चार पंक्तियाँ लिखीं,और वही खामोशीफिर मुझ पर हावी हो गई।अचानकहाथ से कलम छूट गई।वक़्तशायद धीमा हो गया था,या चलना ही भूल गया था—पता नहीं।रात बारह के पार थी।सन्नाटा इतना गहराकि दीवारेंमेरी साँसें सुन रही थीं।अक्सर जब जिंदगी इतनी खामोश हो जाती हैं,तो चलती हुई सांसे भी हमारेकानों को चुभने लगती है,दुनिया मैं 8 अरब से ज्यादा इंसान हैफिर भी हम लोग इतने अकेले क्यों है आजकल ,हर किसी के पास कोई न कोई कहानी है,पर कोई सुनने वाला ही नहीं है,और जब कोई चला जाए सब कुछ