मैं दादा-दादी की लाड़ली

मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनकी पोती नहीं थी,बल्कि उनके दिन की शुरुआतऔर शाम का सुकून भी थी।मुझे आज भी याद है,जब मैं छोटी-छोटी बातों पर रो दिया करती थी,तो दादा मुझे अपने कंधों पर बिठा लेते थेऔर दादी अपने दुपट्टे सेमेरे आँसू पोंछ दिया करती थीं।उन दोनों के साथ रहते हुएकभी यह एहसास ही नहीं हुआकि ज़िंदगी में किसी चीज़ की कमी भी हो सकती है।मैं छोटी थी,पर बहुत ज़िद्दी