64. हॉस्पिटल में एक नया कांडउनका परफैक्ट घटना स्थल तैयार था। जो एक सामान्य भयावह हादसा लग रहा था— चिलचिलाती धूप में धूँ-धूँ कर जलती गाड़ियाँ— उनके तितर-बितर बिखरे पड़े जले काले धुएँ छोड़ते टायर, परखच्चे उड़े दरवाज़े, हमारे कवच और महाशक्ति के भविष्य टूटे जैसे शीशे, चकनाचूर बिखरी बंपर, टूटी हेडलाइट और अन्य अवशेष अपने जगह बनाकर इस भयावह हादसे कि गवाही दे रहे थे। उनके बगल पड़े टूटे-फूटे लोग, जो कभी भी लाशे बन सकती थी मदद का इंतज़ार कर रहे थे। पर मदद दूर-दूर तक दिखाई-सुनाई तो क्या, छठी इंद्रियों में भी उनका आभास नहीं हो रहा