राख में दबी मोहब्बतपटना की पुरानी गलियों में बसी एक छोटी-सी कोठी थी, जहाँ हवा हमेशा उदास लगती। शाम ढलते ही सूरज की किरणें खिड़की से आकर फर्श पर लंबी-लंबी परछाइयाँ डालतीं, मानो कोई अनदेखा मेहमान चुपके से आ धमका हो। इस कोठी में रहती थी नेहा – एक 28 साल की लड़की, जिसकी आँखों में हमेशा एक खालीपन तैरता रहता। उसके कमरे का कोना एक पुरानी लकड़ी की मेज़ से सजा था, जिस पर सैकड़ों ख़त बिखरे पड़े थे। हर ख़त अधूरा था, हर ख़त में वही नाम – 'अर्जुन'।नेहा हर महीने एक ख़त लिखती। पहला ख़त लिखा था